आचार्य सोमदेव जी : वैदिक शिक्षा एवं संस्कृति के समर्पित साधक
आचार्य सोमदेव जी ने वर्ष 1998 में गृहत्याग कर वैदिक शिक्षा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के मार्ग को अपनाया। इसके पश्चात लगभग 12 वर्षों तक विभिन्न गुरुकुलों एवं वैदिक संस्थानों में रहकर उन्होंने गहन अध्ययन एवं साधना की तथा व्याकरणाचार्य, दर्शनाचार्य, निरुक्ताचार्य, न्यायाचार्य एवं मीमांसा तीर्थ जैसी प्रतिष्ठित उपाधियाँ प्राप्त कीं।
आचार्य जी ने गुरुकुल सुंदरपुर, रोहतक; आर्ष गुरुकुल खानपुर, नारनौल; ऋषि उद्यान, अजमेर; संजीवनी गुरुकुल, मैसूर तथा वानप्रस्थ आश्रम, रोजड़ सहित अनेक प्रतिष्ठित वैदिक संस्थानों में अध्ययन किया।वैदिक शिक्षा के साथ-साथ आचार्य सोमदेव जी की लेखनी भी अत्यंत प्रभावशाली रही है। प्रतिष्ठित परोपकारी पत्रिका के ‘जिज्ञासा समाधान’ स्तंभ में उनके लेख वर्षों तक प्रकाशित होते रहे। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘जिज्ञासा विमर्श’ के दो भाग तथा ‘सौम्य कथा माला’ प्रमुख हैं।
वैदिक ज्ञान एवं समाज में उनके योगदान के लिए उन्हें वैदिक विद्वान पुरस्कार, आर्य गौरव पुरस्कार तथा राष्ट्रीय वेद-वेदांग पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।
पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से आचार्य सोमदेव जी देशभर में वैदिक सिद्धांतों, सत्य, धर्म एवं संस्कारों के प्रचार-प्रसार में निरंतर सक्रिय हैं। उनके प्रयासों का उद्देश्य वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना तथा नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति एवं वैदिक जीवन-मूल्यों से जोड़ना है।
वर्तमान में आचार्य सोमदेव जी स्वामी आत्मानंद वैदिक गुरुकुल के संचालन एवं वैदिक शिक्षा के प्रसार के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में गुरुकुल परंपरा, वैदिक शिक्षा एवं संस्कारमय जीवन के मूल्यों को आगे बढ़ाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।